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कड़े पर खरे शब्द : सेकुलरिज्म सिर्फ आपको टूचिया बनाने के लिए बनाया गया है !

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हिन्दू कट्टरपंथी आपस में सब भाई भाई– बहुत सुन्दर, इन्सानियत से बड़ा कोई धर्म नहीँ है – वाह वाह- क्या बात है, मजहब नही सिखाता आपस में बैर करना – हाय में मर जावां, एक हम ही तो रह गये हैं टूचिया बनने के लिये- एशिया के अंतिम छोर तक फैला भारत और हिन्दू संस्कृति इतना छोटा कैसे हो गया।

फितरत– पाकिस्तान में हिन्दू थे, सिख थे, कुछ इसाई थे और फिर, सुन्नी मुस्लिम थे..शिया मुस्लिम थे.. अहमदिया मुस्लिम थे…सबसे पहले – हिन्दूओं को मारा गया क्यूंकि इन काफिर हिंदुओ को मारना पहला काम माना गया है (पाकिस्तान के स्कूलों में भी ये पढ़ाया जाता है, गज़वा हिन्द इत्यादि) फिर वो ख़त्म होने को आये तो – इसाईओं – को मारा गया… फिर ये दोनों ख़त्म होने को आये थे तो सिख – जो वैसे भी कम थे.. कब ख़त्म कर दिए गए पता ही नहीं चल पाया…

फिर बचे – खुद कट्टरपंथी … तो भाईजान अब क्या करें, अब किन सालों को काटें… टेंशन में आ गये, हमारी तो आदत है खून खराबा करने की, तो ऐसे तो बैठ ही नहीं सकते ना, वर्ना जीने का मजा क्या… तभी पाकिस्तान में घोषणा की गयी की… अहमदिया ..मुस्लिम नहीं है .. नकली मुस्लिम है …. बस रातों रात सारे –“सुन्नी और शिया” मुस्लिम “अहमदिया” मुस्लिम को मारने दौड़ पड़े…सारे अहमदिया मारे जाने लगे और पाकिस्तान छोड़ कर इधर उधर जंगल में दूसरे देशों में भागने लगे, जो भाग पाये वो बच गये जो नही भाग पाये वो काट डाले गये।

ध्यान रहे — “हिन्दू , इसाई, सिख आदि को मारते समय में ये –“अहमदिया” सहित तीनों भाई भाई थे। तीनों ने आपसी भाईचारे से खूब साथ निभाया था.. और अब अहमदिया खुद काटे जा रहे थे…धीरे धीरे – “अहमदियों” का मामला “अल्लाह”- ने निपटा दिया.. अब बचे –“शिया और सुन्नी”– दोनों बैठे रहे..बैठे रहे..बैठे रहे….परेशान होने लगे, बेचैन होने लगे

दोनों सोच रहे थे.. हम तो इंसानों की हत्या ना करें तो कैसे कट्टरपंथी, .. किसको मारें आखिर करें क्या..तभी सुन्नियों की सभा हुई और फैंसला लेकर एलान कर दिया कि… शिया सच्चा मुस्लमान नहीं होता है… ये भी काफिर है, और अभी हाल ही में शियाओं को काफिर घोषित करने वाले फंफ्लेट भी पाकिस्तान में बांटे गए, बस खेल फिर शुरू.. और फिर निकल गयी तलवारें ..

अभी आप सुनते होंगे की पाकिस्तान के डेरा इस्माइल खान में मस्जिद में बम ब्लास्ट, असल में ये शिया मस्जिद होती है, अफगानिस्तान, इराक जहाँ भी मस्जिद में नमाज़ के बाद ब्लास्ट इत्यादि की खबरें होती है, ये सुन्नी आतंकियों द्वारा शिया मस्जिद पर हमले ही होते है, कट्टरपंथियों की फितरत में ही अशांति है 

और आपको सेकुलरिज्म का जो डोज दिया जाता है, सबसे पहले एक बार खुद से ही पूछ लें की, पाकिस्तान, बांग्लादेश, कश्मीर में जो लाखो करोडो हिन्दू, सिख इत्यादि  थे, ये कहाँ गए, क्या इन्हे धरती निगल गयी या आसमान खा गया, इस सवाल को अपने मन से ही पूछे उसके बाद चाहे सेकुलरिज्म का जितना डोज लेना हो लेते रहे 

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