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ब्राह्मण तो बहाना है, असल में हिन्दू निशाना है – फूट डालो और हिन्दू पर शासन करो

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*हिंदुओं में जाति के भेद को जगह नहीं है, अतः भ्रम ना फैलाएँ…* आस्तिक जीवन में  ◆ *श्रीकृष्ण* हमारे आराध्य देव रहे और बलदाऊ जी हमारे कुल परम्परा के आराध्य हैं और दोनों ही पिछड़े वर्ग यानि ‘यादव’ समुदाय से है, न कि ब्राह्मण ।

◆ भील जाति की माता *शबरी* आज भी हमारी श्रद्धेया हैं।  ◆ हनुमान जी भी कहीं से भी ब्राह्मण न होकर वा-नर ‘जनजाति’ (ST) वर्ग से हैं। ◆ महर्षि *वाल्मीकि* की पूजा हम श्रीराम से भी पहले करते है और उनकी जाति हरिजन है। मेरे बेटे को बचपन से ही हमारे हरिजन गोद में खिलाते आ रहे है। वैसे…  ◆ भगवान *श्रीराम* भी ब्राह्मण तो नहीं ही थे। ◆ *शिवजी* तो स्वयं जनजाति समुदाय से है और हमारे सर्वोपरि पूज्य है। भोले बाबा यानि देवों के देव ‘महादेव’ से बड़ा आदिवासी कौन है ? ब्राह्मण इसी आदिवासी को सबसे कल्याणकारी देवता मानते हैं।

विद्यार्थी जीवन में ● *कबीरदास* जी, जो जाति से ‘जुलाहा’ थे और  ● *रैदास* (या रविदास) जी, जो जाति से चमार थे; हमारे प्रेरणास्रोत रहे। मुझे किसी ब्राह्मण देवता या कवि के बारे में नहीं मालूम, जिसका स्थान हमारे दिल में, इन गैर-ब्राह्मण देवों या कवियों, साहित्यकारों से कम हो।

राजनीति शास्त्र और इतिहास का विद्यार्थी होने से मैं बचपन से ही *भीमराव अम्बेडकर* से अत्यंत प्रभावित रहा और आज भी हूँ परन्तु उनको बिना पढ़े और समझे जिस तरह भ्रम फैलाया जा रहा है, वह सचमुच *घटिया मानसिकता* का परिचायक है। अम्बेडकर कहीं से भी ब्राह्मण-विरोधी नहीं हैं। उनके ब्राह्मण अध्यापक ने उनको अपना सरनेम *’अम्बेडकर’* दिया था। अंबेडकर जी विभेदकारी व्यवस्था के विरोधी थे।

हिन्दुओं में जाति से कोई लेना-देना नहीं है, अन्यथा *सारे भगवान गैर- ब्राह्मण* नहीं होते। ब्राह्मण तो इन गैर- ब्राह्मण देवताओं की पूरी आस्था और विश्वास से पूजा करता है न कि स्वयं पूजा जाता है।

*महर्षि वाल्मीकि और महर्षि वेदव्यास* कभी महर्षि की पदवी नहीं पाते। सनातन काल से ही अधिकांश महर्षि और ॠषि मुनि और वर्तमान के भी अधिकांश साधु-संत गैर-ब्राह्मण है और *ब्राह्मण इन सभी का आदर-सत्कार* करते है।

*भगवान बुद्ध और भगवान महावीर* की गणना भी चौबीस अवतारों में हम करते ही हैं और ये दोनों भी *’क्षत्रिय’* है। ● वर्ण व्यवस्था के नाम पर जिस *मनु* महाराज को गालियां दी जाती है वह भी *’क्षत्रिय’* थे।  ● महर्षि वेदव्यास ‘मछुआरिन’ के बेटे थे और किसी भी तरह ब्राह्मण नहीं थे, परन्तु ‘महर्षि’ कहलाए । इसलिए- यह समझना चाहिए कि यह केवल *”फूट डालो और राज करो”* का भयानक षडयन्त्र है।

मैं अपनी मित्र मण्डली की तरफ देखता हूँ तो 2-3 को छोड़कर सभी गैर-ब्राह्मण है, सभी जातियों और धर्मों में मेरे अजीज और भरोसेमंद ईमानदार दोस्त हैं । आर्थिक रूप से मेरी स्थिति मेरे सभी मित्रों से खराब ही रही थी यानि ब्राह्मण भी गरीबी के दुश्चक्र में फ़ंसे हुए हैं। इतिहास में भी ब्राह्मण के साथ *”गरीब ब्राह्मण”* का टैग ही हम पाते है चाहे वह *सुदामा* भगत हो या *नरसी भगत*।  ब्राह्मण शायद ही कभी चक्रवर्ती शासक रहा हो।

ब्राह्मण (चाणक्य) ने भी शासन के लिए चन्द्रगुप्त को ही चुना जिसे अनेक इतिहासकार *SC या अन्य पिछड़े वर्ग (OBC)* से संबंधित मानते है। इसलिए मेरी राय में *’जाति और धर्म’* के आधार पर अपने को चमकाने वाले *”हल्के चरित्र और ओछी मानसिकता”* के लोग है और फेसबुक पर इनकी बहुतायत मालूम पड़ती है।

दरअसल,  *ब्राह्मण तो बहाना* है,  “फूट डालकर राज करना” ही निशाना है। एक झूठ को अगर सौ बार बोला जाए, तो वह सच लगने लगता है और ब्राह्मण इस झूठ का *सर्वाधिक शिकार* हुआ है, परन्तु फिर भी कभी “जाति आधारित संघर्ष” को प्रोत्साहित नहीं किया और *”सर्वे भवन्तु सुखिन:”* और *”वसुधैव कुटुंबकम्”* को अपना ध्येय वाक्य बनाया है।

यों बहुत ही *अल्प मात्रा में ओछी और घटिया मानसिकता के लोग हर जाति*, धर्म और समुदाय में है जो परस्पर जातीय वैमनस्य फैलाने को ही अपना मिशन बनाए हुए हैं..  परन्तु-  99.99% भारतीय आज भी *”संगठित भारत-सशक्त भारत”* में यकीन करते है। {भा. प्र. से. (IAS) के वरिष्ठ अधिकारी मणिरामन राम जी के कलम से}

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